विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर वृक्षरोपण कार्यक्रम
दिनांक 5 जून 2025 को नागरिक अधिकार मंच के तत्वाधान में स्थानीय शासकीय माध्यमिक शाला पोलीपाथर में विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर वृक्षारोपण कार्यक्रम का आयोजन किया गया | इस कार्यक्रम अतिथियों और महिलाओं के द्वारा 10 आम, नीम और अशोक के वृक्ष लगाये गए , इस कार्यक्रम में अधिवक्ता अरविन्द श्रीवास्तव जी और शाला प्राचार्य शर्मा जी उपस्थित रहे |
वृक्षरोपण कार्यक्रम के बाद अधिवक्ता अरविन्द श्रीवास्तव जी ने महिलाओं से अनुरोध किया कि आप सभी मात्ये है और जैसे बच्चे को छोटे में विशेष ध्यान रखा जाता है उसके बाद बच्चा स्वयं धीरे धीरे बढ़ाता जाता है ठीक इसी प्रकार प्रारंभ के चार पांच माह आप लोगो को इन पेंड़ो को देखभाल करना होगा उसके बात यह स्वयं ही विकसित हो जावेगे , यह आप लोगो अच्छी पहल है आज दुनिया को वृक्ष लगाकर ही बचाया जा सकता है |
इस कार्यक्रम में कौशल कबीर, संपत्ति देवी, सुषमा चौधरी, उषा चौधरी, अनीता चौधरी, आरती गोयल, प्रभा चौधरी, सुनीता चौधरी, छोटी बाई, उर्मिला कोल, ज्योति चौधरी, ईशा चौधरी और कविता चौधरी उपस्थित रहे
पर्यावरण पर युवाओं का एक दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम
पर्यावरण के मुद्दे पर युवाओं की समझ को विकसित करने उद्देश्य से नागरिक अधिकार मंच के तत्वाधान एवं पैरवी नई दिल्ली के सहयोग से एक दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया
कार्यक्रम समन्वयक सुश्री पूजा भुर्रक द्वारा प्रतिभागियों को इस कार्यशाला से जुड़ी अपनी अपेक्षाएँ साझा करने हेतु प्रोत्साहित किया गया। इसके लिए एक आकर्षक पोस्टर तैयार किया गया, जिस पर सभी प्रतिभागियों को स्टिकी नोट्स के माध्यम से अपनी-अपनी अपेक्षाएँ लिखकर चिपकाने के लिए आमंत्रित किया गया। प्रतिभागियों ने उत्साहपूर्वक भाग लेते हुए जलवायु परिवर्तन की गहन समझ प्राप्त करने, पर्यावरण संरक्षण से जुड़े व्यावहारिक उपाय सीखने, समुदाय में प्रभावी जागरूकता फैलाने की रणनीतियाँ जानने तथा अपने व्यक्तिगत ज्ञान और क्षमताओं में वृद्धि करने जैसी अपेक्षाएँ व्यक्त कीं। यह गतिविधि न केवल प्रतिभागियों की सोच और आवश्यकताओं को समझने का माध्यम बनी, बल्कि आयोजकों को भी कार्यशाला की दिशा और प्रभावशीलता को और अधिक सार्थक बनाने में महत्वपूर्ण आधार प्रदान किया। इस प्रक्रिया ने संपूर्ण सत्र को सहभागितापूर्ण, प्रेरणादायक और लक्ष्य-उन्मुख रूप प्रदान किया।
कार्यशाला की शुरुआत नगरिक अधिकार मंच के निर्देशक श्री शिव कुमार द्वारा गरिमापूर्ण स्वागत भाषण से हुई। उन्होंने सर्वप्रथम कार्यशाला के फैसिलिटेटर श्री रजनीश (संस्था Pairvi) तथा उपस्थित सभी प्रतिभागियों का हार्दिक स्वागत किया। इसके बाद उन्होंने सरल और प्रभावी उदाहरणों के माध्यम से जलवायु तथा जलवायु परिवर्तन की मूल अवधारणाओं को समझाया।
उन्होंने बताया कि जलवायु परिवर्तन हमारे दैनिक जीवन और आजीविका पर किस प्रकार प्रभाव डालता है—कभी तीव्र गर्मी का बढ़ जाना, कभी अचानक भारी वर्षा का होना, और कभी अत्यधिक ठंड जैसी परिस्थितियाँ इसी परिवर्तन का संकेत हैं। उन्होंने विशेष रूप से यह रेखांकित किया कि समाज के कुछ वर्ग जैसे सब्ज़ी विक्रेता, ठेला-खुमचा चलाने वाले, घरेलू कामकाजी महिलाएँ तथा दिहाड़ी मज़दूर इस परिवर्तन से सबसे अधिक प्रभावित होते हैं, क्योंकि उनकी आय और जीवनयापन सीधे मौसम की स्थिरता पर निर्भर करता है।
श्री शिव कुमार ने आगे कहा कि जलवायु परिवर्तन, उसके कारणों, दुष्प्रभावों और उससे निपटने के उपायों को विस्तृत रूप से समझाने हेतु आज हमारे बीच श्री रजनीश उपस्थित हैं, जो Pairvi संस्था के माध्यम से लंबे समय से जलवायु परिवर्तन जागरूकता पर कार्य कर रहे हैं और कई संगठनों के साथ इस विषय पर सक्रिय रूप से जुड़े हुए हैं। इसी क्रम में उन्होंने श्री रजनीश को मंच संभालने तथा कार्यक्रम को आगे बढ़ाने हेतु ससम्मान आमंत्रित किया।
फैसिलिटेटर श्री राजनीश जी ने सत्र की शुरुआत सभी प्रतिभागियों से अपना संक्षिप्त परिचय देने का अनुरोध करते हुए की। परिचय के पश्चात् उन्होंने प्रतिभागियों की पूर्व-ज्ञान की स्थिति समझने हेतु कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न पूछे—जैसे कितने प्रतिभागी विज्ञान विषय से हैं तथा कितने लोग पहले से ‘क्लाइमेट चेंज’ और उसके प्रभावों के बारे में जानकारी रखते हैं। इस संवादात्मक प्रारंभ ने प्रतिभागियों को सक्रिय रूप से चर्चा में शामिल किया और विषय के प्रति उनकी समझ का प्रारंभिक आकलन भी हुआ।
ज्योति ने अपने शब्दों में कहा कि हमारे आस-पास के वातावरण में होने वाला तेज बदलाव ही जलवायु परिवर्तन है। इन उत्तरों से स्पष्ट हुआ कि प्रतिभागियों में इस मुद्दे को लेकर प्रारंभिक जागरूकता मौजूद है, जिसे आगे सत्र में विस्तार से समझाया गया।
राजनीश जी ने इसके पश्चात् मौसम, जलवायु और पर्यावरण के बीच अंतर को स्पष्ट किया। उन्होंने बताया कि मौसम किसी सीमित क्षेत्र में कुछ समय के लिए हवा-पानी में होने वाले परिवर्तन को कहते हैं। इसके विपरीत जलवायु किसी देश या बड़े क्षेत्र में लगभग 30 वर्षों की अवधि में घटित होने वाली जलवायु संबंधी घटनाओं के औसत पैटर्न को दर्शाती है। वहीं पर्यावरण का अर्थ हमारे आसपास का समग्र वातावरण है, जिसके अंतर्गत मौसम और जलवायु दोनों शामिल होते हैं।
जलवायु परिवर्तन का अर्थ है किसी क्षेत्र की दीर्घकालिक जलवायु संबंधी घटनाओं में होने वाला धीरे-धीरे लेकिन निरंतर बदलाव। सामान्य परिस्थितियों में जलवायु का एक निश्चित पैटर्न होता है, किंतु मानव गतिविधियों के बढ़ते प्रभाव ने इस संतुलन को बदलना शुरू कर दिया। औद्योगिक क्रांति के समय से ही प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन, जीवाश्म ईंधनों का अनियंत्रित उपयोग और बढ़ता प्रदूषण वैश्विक तापमान में वृद्धि का कारण बने हैं। वर्ष 1860 तक वातावरण में कार्बन का स्तर स्थिर था, लेकिन औद्योगिक क्रांति के बाद कोयला, पेट्रोल और डीज़ल जैसे ईंधनों की खपत तेजी से बढ़ी, जिससे कार्बन की मात्रा वायुमंडल में असामान्य रूप से बढ़ने लगी। कार्बन कण सूर्य की पराबैंगनी किरणों को अधिक मात्रा में अवशोषित करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप पृथ्वी का तापमान लगभग 1.5 डिग्री तक बढ़ गया है। तापमान में यह तेजी से वृद्धि पृथ्वी पर जीवन के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न कर रही है—जिसमें मौसम की चरम घटनाएँ, जैव विविधता का नष्ट होना, समुद्र स्तर में वृद्धि और मानव जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव शामिल हैं। यही कारण है कि जलवायु न्याय आज एक अत्यंत महत्वपूर्ण मुद्दा बन गया है और यह सामाजिक न्याय से अलग नहीं माना जा सकता, क्योंकि जलवायु परिवर्तन का अधिकतम दुष्प्रभाव समाज के कमजोर और संवेदनशील वर्गों को झेलना पड़ता है।
जलवायु परिवर्तन के कारण पृथ्वी का तापमान लगभग 1.2 डिग्री तक बढ़ चुका है, और वैज्ञानिकों का मानना है कि अब यह तापमान पूर्व स्थिति में लौट पाना संभव नहीं है। इसके प्रभाव आज हमारे आसपास स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं। बढ़ते तापमान और बदलती जलवायु परिस्थितियों के कारण लगभग 10 लाख से अधिक प्रजातियाँ नष्ट हो चुकी हैं, जिससे जैव विविधता पर गंभीर खतरा उत्पन्न हो गया है। समुद्र के जल-स्तर में भी वर्ष 1860 के बाद से लगभग 0.6 मीटर की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, और यह वृद्धि तेज़ी से जारी है। अनुमान है कि जब समुद्र का जल-स्तर 2.5 मीटर तक पहुँच जाएगा, तो तटीय क्षेत्रों के अनेक गाँव और शहर डूबने लगेंगे, जिससे बड़े पैमाने पर पलायन होगा। यह पलायन उपलब्ध संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव डालेगा और सामाजिक-आर्थिक असंतुलन को बढ़ाएगा। तापमान में वृद्धि के कारण अत्यधिक वाष्पीकरण होता है, जिससे अधिक वर्षा, बादल फटना, अत्यधिक आर्द्रता और अचानक आने वाली बाढ़ जैसी स्थितियाँ सामान्य होती जा रही हैं। कुल मिलाकर, जलवायु परिवर्तन मानव, वन्यजीव और पर्यावरण—तीनों के अस्तित्व के लिए गंभीर खतरा बन चुका है, जिसे अनदेखा करना किसी भी रूप में संभव नहीं है।
जलवायु परिवर्तन के लिए कौन जिम्मेदार है और जलवायु न्याय कैसे प्राप्त हो सकता है?
एक वीडियो के माध्यम से बताया गया कि जलवायु परिवर्तन के बढ़ते संकट के लिए मुख्य रूप से उद्योगिक गतिविधियाँ, अत्यधिक प्रदूषण फैलाने वाली उद्योग इकाइयाँ तथा विकसित देश जिम्मेदार हैं। अनेक विकसित राष्ट्र आज भी जलवायु परिवर्तन और जलवायु न्याय जैसे मुद्दों को गंभीरता से नहीं लेते, जबकि ऐतिहासिक रूप से सबसे अधिक कार्बन उत्सर्जन इन्हीं देशों द्वारा किया गया है। औद्योगिक क्रांति से लेकर आज तक ऊर्जा, परिवहन और उत्पादन के नाम पर जीवाश्म ईंधनों का सबसे अधिक उपयोग इन्हीं राष्ट्रों ने किया है, जिसके कारण पृथ्वी के तापमान में तेजी से वृद्धि हुई। ऐसे में, जलवायु न्याय का सिद्धांत यह कहता है कि जो देश ऐतिहासिक रूप से अधिक प्रदूषण के लिए जिम्मेदार हैं, उन्हें विकासशील और अल्प-विकसित देशों को तकनीकी सहायता, स्वच्छ ऊर्जा से जुड़ी तकनीकें तथा वित्तीय सहयोग उपलब्ध कराना चाहिए। इसका उद्देश्य यह है कि गरीब और विकासशील देशों की विकास गति प्रभावित न हो, और वे पर्यावरण-अनुकूल तकनीकों को अपनाकर जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से स्वयं को सुरक्षित रख सकें। इस प्रकार जलवायु न्याय केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि वैश्विक समानता, जिम्मेदारी और सहयोग की मांग करने वाला सामाजिक एवं नैतिक प्रश्न भी है।
भारत के संदर्भ में जलवायु न्याय
भारत में जलवायु परिवर्तन का प्रभाव केवल पर्यावरणीय संकट तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक और आर्थिक असमानता को भी गहरा कर रहा है। जिनके पास संसाधन हैं—विशेषकर बड़े उद्योगपति—वे प्राकृतिक संपदाओं का अधिक उपयोग कर लाभ उठाते रहते हैं, जिससे अमीर और अधिक अमीर तथा गरीब और अधिक गरीब होता जा रहा है। दूसरी ओर, प्राकृतिक आपदाएँ जैसे बाढ़, सूखा, चक्रवात, बादल फटना आदि गरीब और कमजोर वर्गों को सबसे अधिक प्रभावित करती हैं, क्योंकि उनकी आर्थिक क्षमता पहले से ही कमज़ोर होती है। इस प्रकार जलवायु परिवर्तन के कारण उनकी आजीविका, आवास, स्वास्थ्य और सुरक्षा पर सीधा असर पड़ता है। यही कारण है कि भारत के संदर्भ में जलवायु न्याय केवल पर्यावरण का प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का भी महत्वपूर्ण मुद्दा है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को “जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता” का अधिकार प्रदान करता है, परंतु जब जलवायु परिवर्तन के कारण लोगों का जीवन खतरे में पड़ता है, उनकी आजीविका नष्ट होती है या उन्हें पलायन करने पर मजबूर होना पड़ता है, तो यह अधिकार प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होता है। इसलिए भारत में जलवायु न्याय सुनिश्चित करना संविधानिक दायित्व, सामाजिक समानता तथा टिकाऊ विकास—तीनों के लिए अत्यंत आवश्यक है।
जीविकोपार्जन पर प्रभाव
बढ़ती गर्मी ने आजीविका कमाने और खर्च के संतुलन को गम्भीर रूप से बिगाड़ दिया है। अत्यधिक तापमान के कारण मजदूरी के घंटे कम हो रहे हैं, श्रमिकों की कार्यक्षमता घट रही है और कृषि तथा निर्माण जैसे क्षेत्रों में उत्पादन प्रभावित हो रहा है। एक मूल्यांकन के अनुसार वर्ष 2050 तक बढ़ती गर्मी और जलवायु परिवर्तन के चलते लोगों की आय में लगभग 19% तक की कमी आ सकती है। इसका सीधा असर गरीब और श्रम-आधारित समुदायों पर पड़ता है, जिनकी जीविका मौसम पर निर्भर होती है।
मिथक : जनसंख्या वृद्धि और वृक्षारोपण
अक्सर यह माना जाता है कि जलवायु परिवर्तन का मुख्य कारण केवल जनसंख्या वृद्धि है, परन्तु यह पूरी तरह सत्य नहीं है। यह एक मिथक है कि अधिक जनसंख्या ही पर्यावरणीय संकट की जड़ है। वास्तविकता यह है कि संसाधनों का असमान उपयोग, औद्योगिक प्रदूषण, अत्यधिक उपभोग और बड़े देशों द्वारा वर्षों से किया जा रहा कार्बन उत्सर्जन जलवायु परिवर्तन के प्रमुख कारण हैं। कम संसाधनों वाले गरीब लोगों की तुलना में समृद्ध वर्ग और विकसित राष्ट्र कई गुना अधिक कार्बन उत्सर्जन करते हैं।
इसी प्रकार, यह धारणा भी अधूरी है कि केवल वृक्षारोपण करने से जलवायु संकट हल हो जाएगा। पेड़ लगाना निश्चित रूप से आवश्यक है, लेकिन उससे भी अधिक जरूरी है कि मौजूदा पेड़ों और जंगलों को कटने से बचाया जाए। नए लगाए गए पौधों को बड़े पेड़ बनकर कार्बन अवशोषित करने में कई दशक लग जाते हैं, जबकि पुराने पेड़ तुरंत और अधिक मात्रा में पर्यावरण संरक्षण में योगदान देते हैं। इसलिए केवल पौधे लगाना ही समाधान नहीं, बल्कि जंगलों को सुरक्षित रखना, वनों की कटाई रोकना और प्राकृतिक पर्यावरण को संतुलित बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है।
श्री शिव कुमार जी के विचार—
श्री शिव कुमार जी ने अपने उद्बोधन में वैश्विक जलवायु संकट के ऐतिहासिक कारणों पर गहराई से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि औद्योगिक क्रांति ने जहाँ उत्पादन और तकनीक को गति दी, वहीं इसने प्रकृति के संतुलन को सबसे अधिक क्षति पहुँचाई। विकसित देशों ने अपनी आर्थिक प्रगति के लिए न केवल अत्यधिक मात्रा में जीवाश्म ईंधन का उपयोग किया, बल्कि छोटे और विकासशील देशों पर शासन करते हुए उनके प्राकृतिक संसाधनों का बेतहाशा दोहन किया। इन संसाधनों को बिना किसी संरक्षण और जिम्मेदारी के इस्तेमाल किया गया, जिसके परिणामस्वरूप आज पूरी दुनिया—खासतौर पर गरीब और कमजोर देश—जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों का बोझ उठा रहे हैं।
श्री शिव कुमार जी ने इस बात पर गहन ज़ोर दिया कि यदि हम एक बेहतर भविष्य की कल्पना करते हैं, तो समाज के प्रत्येक व्यक्ति का जागरूक नागरिक बनना अत्यंत आवश्यक है। जागरूक नागरिक वही होता है जो न सिर्फ अपने अधिकारों को समझता है, बल्कि अपने कर्तव्यों और जिम्मेदारियों के प्रति भी संवेदनशील रहता है। उन्होंने समझाया कि जागरूक बनने का पहला कदम यह है कि हम अपने आसपास होने वाली समस्याओं और मुद्दों को पहचाने—जैसे जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, असमानता, संसाधनों का दुरुपयोग आदि। इसके साथ ही, हमें यह भी समझना चाहिए कि हमारे छोटे-छोटे कार्य—जैसे बिजली का अधिक उपयोग, पानी की बर्बादी, प्लास्टिक का अत्यधिक प्रयोग या पेड़ों की कटाई—दूसरों के जीवन तथा पर्यावरण पर क्या प्रभाव छोड़ते हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि जब हम अपने व्यवहार, उपभोग और जीवनशैली को जिम्मेदारी से अपनाते हैं, तब हम न केवल पर्यावरण की सुरक्षा में योगदान देते हैं, बल्कि समाज को अधिक न्यायपूर्ण और टिकाऊ बनाने की दिशा में भी सक्रिय भूमिका निभाते हैं। उनके अनुसार, परिवर्तन की शुरुआत हमेशा व्यक्तिगत स्तर से होती है, और छोटी-छोटी जागरूक आदतें मिलकर बड़े सामाजिक बदलाव का मार्ग प्रशस्त करती हैं।
विश्व पर्यावरण दिवस पर वृक्षारोपण कार्यक्रम 2026
विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर नागरिक अधिकार मंच के तत्वाधान में वृक्षारोपण कार्यक्रम का आयोजन किया गया .| इस अवसर पर नागरिक अधिकार मंच के द्वारा बागड़ा दफाई पोली पाथर, क्रेसर बस्ती सगड़ा और सुभाष नगर आधारताल में कार्यकर्ताओं के द्वारा वृक्ष लगाये गए |
इस कार्यक्रम में लोगो ने तय किया कि वह लोग अपने बस्ती में परंपरागत और फलदायक वृक्षों को लगायेगे ताकि ज्यादा से ज्यादा पर्यावरण और नागरिको को फायदा हो सके | जिसमे लोगो ने आम, पीपल, बरगत और आवले के वृक्ष लगाये
पर्यावरण के मुद्दे पर चित्रकला प्रतियोगिता
क्रेशर बस्ती, सगड़ा में बच्चों के बीच जलवायु परिवर्तन (क्लाइमेट चेंज) विषय पर एक चित्रकला प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का उद्देश्य बच्चों में पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाना तथा जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को समझने के लिए प्रेरित करना था। प्रतियोगिता में बस्ती के कुल 12 बच्चों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।
प्रतियोगिता के दौरान बच्चों ने अपनी कल्पनाशीलता और रचनात्मकता का परिचय देते हुए जलवायु परिवर्तन से जुड़ी विभिन्न समस्याओं और उनके समाधानों को चित्रों के माध्यम से प्रस्तुत किया। बच्चों ने बढ़ते तापमान, पेड़ों की कटाई, जल संकट, प्रदूषण, ग्लोबल वार्मिंग तथा पर्यावरण संरक्षण जैसे विषयों को अपने चित्रों में दर्शाया। कई बच्चों ने वृक्षारोपण, जल संरक्षण और स्वच्छ पर्यावरण के महत्व को भी आकर्षक ढंग से प्रदर्शित किया।
कार्यक्रम के दौरान बच्चों को जलवायु परिवर्तन के कारणों और इसके दुष्प्रभावों के बारे में सरल भाषा में जानकारी दी गई। साथ ही उन्हें पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार व्यवहार अपनाने और प्रकृति संरक्षण में अपनी भूमिका निभाने के लिए प्रेरित किया गया।
प्रतियोगिता ने बच्चों को अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने का अवसर प्रदान किया तथा पर्यावरणीय मुद्दों के प्रति उनकी समझ को मजबूत किया। सभी प्रतिभागियों के प्रयासों की सराहना की गई और उन्हें भविष्य में भी ऐसे रचनात्मक एवं जागरूकता बढ़ाने वाले कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया गया। यह आयोजन बच्चों में पर्यावरण संरक्षण की भावना विकसित करने की दिशा में एक सार्थक पहल साबित हुआ।
महिलाओं को किचिन गार्डनिंग हेतु बीज वितरण कार्यक्रम
नागरिक अधिकार मंच द्वारा स्व-सहायता समूह की महिलाओं को किचन गार्डन (पोषण वाटिका) विकसित करने के उद्देश्य से विभिन्न प्रकार की मौसमी सब्जियों के बीज वितरित किए गए।
इस पहल का उद्देश्य महिलाओं को अपने घरों में जैविक एवं पौष्टिक सब्जियों का उत्पादन करने के लिए प्रोत्साहित करना, परिवार के पोषण स्तर में सुधार लाना तथा घरेलू खर्च को कम करने में सहयोग प्रदान करना है। किचन गार्डनिंग के माध्यम से महिलाएं आत्मनिर्भर बनेंगी और अपने परिवार को ताज़ी एवं रसायन-मुक्त सब्जियां उपलब्ध करा सकेंगी।
नागरिक अधिकार मंच का प्रयास है कि समुदाय में पोषण सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और महिलाओं के आर्थिक एवं सामाजिक सशक्तिकरण को बढ़ावा दिया जाए।
संदेश:
“हर घर बने पोषण वाटिका, स्वस्थ परिवार हमारी प्रतिबद्धता।” .
नागरिक अधिकार मंच' की देखरेख में महिलाओं द्वारा किचन गार्डनिंग की अनूठी पहल पोषण, आत्मनिर्भरता और टिकाऊ विकास की ओर बढ़ते कदम
‘नागरिक अधिकार मंच’ की देखरेख में, समूह की महिलाओं ने अपने घरों में किचन गार्डनिंग के लिए अलग-अलग मौसम की सब्ज़ियों के बीज बोए। इस पहल का मकसद महिलाओं को पोषण सुरक्षा, आत्मनिर्भरता और जैविक खेती के लिए प्रोत्साहित करना है। बीज बोने की इस गतिविधि से महिलाएं अपने परिवारों के लिए ताज़ी, पौष्टिक और केमिकल-मुक्त सब्ज़ियां उपलब्ध करा पाएंगी और साथ ही घर का खर्च भी कम कर सकेंगी। यह पहल पर्यावरण संरक्षण, हरित जीवनशैली और टिकाऊ विकास को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। महिलाओं की सक्रिय भागीदारी ने इस अभियान को सफल और प्रेरणादायक बनाया।
आधुनिक समय में शुद्ध खान-पान और स्वास्थ्य की सुरक्षा एक बड़ी चुनौती बन चुकी है। बाजार में मिलने वाली रासायनिक खादों और कीटनाशकों से युक्त सब्जियां हमारे स्वास्थ्य को गंभीर नुकसान पहुंचा रही हैं। इस गंभीर समस्या के समाधान और समाज में सकारात्मक बदलाव लाने के उद्देश्य से ‘नागरिक अधिकार मंच’ की देखरेख में एक सराहनीय पहल शुरू की गई है। मंच के मार्गदर्शन में स्थानीय महिलाओं के समूह ने अपने-अपने घरों में ‘किंचन गार्डनिंग’ (गृह वाटिका) की शुरुआत की है। महिलाओं ने अपने घरों के आंगन, छतों और खाली पड़े हिस्सों में अलग-अलग मौसम के अनुसार सब्जियों के बीज बोकर इस अभियान का शंखनाद किया है। यह पहल न केवल स्वास्थ्य, बल्कि आर्थिक और पर्यावरणीय दृष्टिकोण से भी बेहद महत्वपूर्ण है।
इस अभियान का प्राथमिक और सबसे महत्वपूर्ण मकसद महिलाओं और उनके परिवारों को ‘पोषण सुरक्षा’ प्रदान करना है। जब महिलाएं अपने हाथों से घर में सब्जियां उगाएंगी, तो वे पूरी तरह से ताजी, पौष्टिक और केमिकल-मुक्त (रासायनिक मुक्त) होंगी। आजकल बच्चों और महिलाओं में कुपोषण और एनीमिया (खून की कमी) जैसी समस्याएं आम हैं। घर की उगी जैविक सब्जियां विटामिन, मिनरल्स और एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर होती हैं। यह पहल परिवारों, विशेषकर बच्चों और बुजुर्गों के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में एक सुरक्षा कवच का काम करेगी।
